नाथ न रथ नहिं तन पद
नाथ न रथ नहिं तन पद
चौपाई २, दोहा ८० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ २ ॥
अर्थ
हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्रीरामजी ने कहा--हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के युद्ध-प्रस्थान, राम के विजय रथ के महात्म्य और वानर-राक्षस संग्राम का वर्णन है।
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रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ