संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग
संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग
छन्द, दोहा ८२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं॥ भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥
अर्थ
उसने धनुष पर सन्धान करके बाणों के समूह छोड़े। वे बाण सर्प की तरह उड़कर जा लगते थे। पृथ्वी-आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं। वानर भागें तो कहाँ ? अत्यन्त कोलाहल मच गया। वानर-भालुओं की सेना व्याकुल होकर आर्त पुकार करने लगी--हे रघुवीर! हे करुणा-सिंधु! हे आर्तबंधु! हे जन-रक्षक हरि!
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ” प्रकरण का छन्द, दोहा ८२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के युद्ध-प्रस्थान, राम के विजय रथ के महात्म्य और वानर-राक्षस संग्राम का वर्णन है।
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रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ