उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान
दोहा ८० (ग) · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान। लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥ ८० (ग) ॥
अर्थ
उधर से रावण ललकार रहा है और इधर से अंगद और हनुमानजी। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामी की दुहाई देकर लड़ रहे हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ” प्रकरण का दोहा ८० (ग) है। इस प्रकरण में रावण के युद्ध-प्रस्थान, राम के विजय रथ के महात्म्य और वानर-राक्षस संग्राम का वर्णन है।
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रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ