सुभट समर रस दुहु दिसि माते
सुभट समर रस दुहु दिसि माते
चौपाई २, दोहा ८१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥ एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥ २ ॥
अर्थ
दोनों ओर के योद्धा रण-रस में मतवाले हो रहे हैं। वानरों को श्रीरामजी का बल है, इससे वे जयशील हैं (जीत रहे हैं)। एक दूसरे से भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरे को मसल-मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के युद्ध-प्रस्थान, राम के विजय रथ के महात्म्य और वानर-राक्षस संग्राम का वर्णन है।
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रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ