क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत
छन्द १, दोहा ८१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥ मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥ १ ॥
अर्थ
क्रुद्ध काल के समान वे वानर खून बहते हुए शरीरों से शोभित हो रहे हैं। वे बलवान् योद्धा राक्षसों की सेना के योद्धाओं को मसलते और मेघ की तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटों से मारते, दाँतों से काटकर लातों से पीस डालते हैं। वानर-भालू चिल्लाते हैं और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट नष्ट हो जायँ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ” प्रकरण का छन्द १, दोहा ८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के युद्ध-प्रस्थान, राम के विजय रथ के महात्म्य और वानर-राक्षस संग्राम का वर्णन है।
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रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ