सौरज धीरज तेहि रथ चाका
सौरज धीरज तेहि रथ चाका
चौपाई ३, दोहा ८० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥ ३ ॥
अर्थ
शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिये हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इन्द्रियों का वश में होना) और परोपकार--ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण के युद्ध-प्रस्थान, राम के विजय रथ के महात्म्य और वानर-राक्षस संग्राम का वर्णन है।
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रावण का प्रस्थान, राम का विजय रथ