वानरों का समुद्रतट पर आना, संपाती से भेंट और सीताजी के समाचार
समुद्रतट पर निराश बैठे वानरों की भेंट संपाती से होती है। वह उन्हें बताता है कि सीताजी लंका में हैं, जिससे खोज का मार्ग स्पष्ट हो जाता है।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण १२ / १४
प्रकरण पाठ
निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥ २६ ॥
अर्थ:
देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों के लिये प्रभु अपनी इच्छासे [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकार के मोक्षों को त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं।
एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती॥ बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥ १ ॥
अर्थ:
इस प्रकार जाम्बवान बहुत प्रकार से कथाएँ कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वत की कन्दरा में सम्पाती ने सुनीं। बाहर निकलकर उसने बहुत-से वानर देखे। [तब वह बोला--] जगदीश्वर ने मुझे घर बैठे बहुत-सा आहार भेज दिया!
सुनि खग हरष सोक जुत बानी। आवा निकट कपिन्ह भय मानी॥ तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई॥ ५ ॥
अर्थ:
हर्ष और शोक से युक्त वाणी (समाचार) सुनकर वह पक्षी (सम्पाती) वानरों के पास आया। वानर डर गये। उनको अभय करके (अभय-वचन देकर) उसने पास जाकर जटायु का वृत्तान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी।