वानरों का समुद्रतट पर आना, संपाती से भेंट और सीताजी के समाचार

समुद्रतट पर निराश बैठे वानरों की भेंट संपाती से होती है। वह उन्हें बताता है कि सीताजी लंका में हैं, जिससे खोज का मार्ग स्पष्ट हो जाता है।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण १२ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं॥ सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता॥ १ ॥

अर्थ:

यहाँ वानरगण मन में विचार कर रहे हैं कि अवधि तो बीत गयी; पर काम कुछ न हुआ। सब मिलकर आपस में बात करने लगे कि हे भाई! अब तो सीताजी की खबर लिये बिना लौटकर भी क्या करेंगे?

चौपाई

कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी॥ इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई॥ २ ॥

अर्थ:

अंगद ने नेत्रों में जल भरकर कहा कि दोनों ही प्रकार से हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो सीताजी की सुध नहीं मिली और वहाँ जाने पर वानरराज हमें मार डालेंगे।

चौपाई

पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही॥ पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

वे तो पिता के वध होने पर ही मुझे मार डालते। श्रीरामजी ने ही मेरी रक्षा की, इसमें सुग्रीव का कोई एहसान नहीं है। अंगद बार-बार सबसे कह रहे हैं कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।

चौपाई

अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा॥ छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस बचन कहत सब भए॥ ४ ॥

अर्थ:

वानर वीर अंगद के वचन सुनते हैं; किन्तु कुछ बोल नहीं सकते। उनके नेत्रों से जल बह रहा है। एक क्षण के लिये सब सोच में मग्न हो रहे। फिर सब ऐसा वचन कहने लगे--।

चौपाई

हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना। नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना॥ अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई॥ ५ ॥

अर्थ:

हे सुयोग्य युवराज! हम लोग सीताजी की खोज लिये बिना नहीं लौटेंगे। ऐसा कहकर लवणसागर के तट पर जाकर सब वानर कुश बिछाकर बैठ गये।

चौपाई

जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी॥ तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु॥ ६ ॥

अर्थ:

जाम्बवान ने अंगद का दुःख देखकर विशेष उपदेश की कथाएँ कहीं। [वे बोले--] हे तात! श्रीरामजी को मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो।

चौपाई

हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥ ७ ॥

अर्थ:

हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म (श्रीरामजी) में प्रीति रखते हैं।

दोहा

निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥ २६ ॥

अर्थ:

देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों के लिये प्रभु अपनी इच्छासे [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकार के मोक्षों को त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं।

दोहा 27 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती॥ बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार जाम्बवान बहुत प्रकार से कथाएँ कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वत की कन्दरा में सम्पाती ने सुनीं। बाहर निकलकर उसने बहुत-से वानर देखे। [तब वह बोला--] जगदीश्वर ने मुझे घर बैठे बहुत-सा आहार भेज दिया!

चौपाई

आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ॥ कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा॥ २ ॥

अर्थ:

आज इन सब को खा जाऊँगा। बहुत दिन बीत गये, भोजन के बिना मर रहा था। पेट भर भोजन कभी नहीं मिलता। आज विधाता ने एक ही बार में बहुत-सा भोजन दे दिया।

चौपाई

डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना॥ कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी॥ ३ ॥

अर्थ:

गीध के वचन कानों से सुनते ही सब डर गये कि अब सचमुच ही मरना हो गया, यह हमने जान लिया। फिर उस गीध (सम्पाती) को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए। जाम्बवान के मन में विशेष सोच हुआ।

चौपाई

कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥ राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़भागी॥ ४ ॥

अर्थ:

अंगद ने मन में विचार कर कहा--अहा! जटायु के समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजी के कार्य के लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान् के परमधाम को चला गया।

चौपाई

सुनि खग हरष सोक जुत बानी। आवा निकट कपिन्ह भय मानी॥ तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई॥ ५ ॥

अर्थ:

हर्ष और शोक से युक्त वाणी (समाचार) सुनकर वह पक्षी (सम्पाती) वानरों के पास आया। वानर डर गये। उनको अभय करके (अभय-वचन देकर) उसने पास जाकर जटायु का वृत्तान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी।

चौपाई

सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी॥ ६ ॥

अर्थ:

भाई जटायु की करनी सुनकर सम्पाती ने बहुत प्रकार से श्रीरघुनाथजी की महिमा वर्णन की।

दोहा

मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि। बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि॥ २७ ॥

अर्थ:

[उसने कहा--] मुझे समुद्र के किनारे ले चलो, मैं जटायु को तिलांजलि दे दूँ। इस सेवा के बदले मैं तुम्हारी वचन से सहायता करूँगा (अर्थात् सीताजी कहाँ हैं, सो बता दूँगा); जिसे तुम खोज रहे हो उसे पा जाओगे।

दोहा 28 के अंतर्गत
चौपाई

अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा॥ हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई। गगन गए रबि निकट उड़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

समुद्र के तीर पर छोटे भाई जटायु की क्रिया (श्राद्ध आदि) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा-हे वीर वानरो! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानी में एक बार आकाश में उड़कर सूर्य के निकट चले गये।

चौपाई

तेज न सहि सक सो फिरि आवा। मैं अभिमानी रबि निअरावा॥ जरे पंख अति तेज अपारा। परेउँ भूमि करि घोर चिकारा॥ २ ॥

अर्थ:

वह (जटायु) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। (किन्तु) मैं अभिमानी था, इसलिये सूर्य के पास चला गया। अत्यन्त अपार तेज से मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोर से चीख मारकर जमीन पर गिर पड़ा।

चौपाई

मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखि करि मोही॥ बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा। देहजनित अभिमान छड़ावा॥ ३ ॥

अर्थ:

वहाँ चन्द्रमा नाम के एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकार से मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित (देहसम्बन्धी) अभिमान को छुड़ा दिया।

चौपाई

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही॥ तासु खोज पठइहि प्रभु दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता॥ ४ ॥

अर्थ:

त्रेतायुग में साक्षात् परब्रह्म मनुष्य शरीर धारण करेंगे। उनकी स्त्री को राक्षसों का राजा हर ले जायगा। उसकी खोज में प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे मिलने पर तू पवित्र हो जायगा।

चौपाई

जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता॥ मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू॥ ५ ॥

अर्थ:

और तेरे पंख उग आयेंगे; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजी को दिखा देना। मुनि की वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभु का कार्य करो।

चौपाई

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका॥ तहँ असोक उपबन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत अहई॥ ६ ॥

अर्थ:

त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। वहाँ स्वभाव ही से निडर रावण रहता है। वहाँ अशोक नाम का उपवन (बगीचा) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [इस समय भी] वे सोच में मग्र बैठी हैं।

दोहा

मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार। बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार॥ २८ ॥

अर्थ:

मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते; क्योंकि गीध की दृष्टि अपार होती है (बहुत दूर तक जाती है)। क्या करूँ? मैं बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता।