तेज न सहि सक सो फिरि
तेज न सहि सक सो फिरि
चौपाई २, दोहा २८ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
तेज न सहि सक सो फिरि आवा। मैं अभिमानी रबि निअरावा॥ जरे पंख अति तेज अपारा। परेउँ भूमि करि घोर चिकारा॥ २ ॥
अर्थ
वह (जटायु) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। (किन्तु) मैं अभिमानी था, इसलिये सूर्य के पास चला गया। अत्यन्त अपार तेज से मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोर से चीख मारकर जमीन पर गिर पड़ा।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “संपाती से भेंट और सीता के समाचार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समुद्रतट पर वानरों की संपाती से भेंट और सीताजी के लंका में होने के समाचार का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
संपाती से भेंट और सीता के समाचार