गुफा में तपस्विनी स्वयंप्रभा के दर्शन

सीताजी की खोज करते हुए वानर एक अद्भुत गुफा में पहुँचते हैं, जहाँ तपस्विनी स्वयंप्रभा से उनका मिलन होता है। वह उनका आदरपूर्वक सत्कार करती हैं और उन्हें आगे का मार्ग दिखाती हैं।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ११ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

दूरि ते ताहि सबन्हि सिरु नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा॥ तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना॥ १ ॥

अर्थ:

दूर से ही सब ने उसे सिर नवाया और पूछने पर अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब उसने कहा--जलपान करो और भाँति-भाँति के रसीले सुन्दर फल खाओ।

चौपाई

मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए॥ तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई॥ २ ॥

अर्थ:

[आज्ञा पाकर] सब ने स्नान किया, मीठे फल खाए और फिर सब उसके पास चले आए। तब उसने अपनी सब कथा कह सुनाई [और कहा--] मैं अब जाऊँगी जहाँ श्रीरघुराई हैं।

चौपाई

मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू॥ नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा॥ ३ ॥

अर्थ:

तुम लोग आँखें मूँद लो और गुफा को छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजी को पा जाओगे, पछताओ नहीं (निराश न होओ)। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्र के तीर पर खड़े हैं।

चौपाई

सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा॥ नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही॥ ४ ॥

अर्थ:

और वह स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभु के चरणकमलों में मस्तक नवाया और बहुत प्रकार से विनती की। प्रभु ने उसे अपनी अनपायिनी (अचल) भक्ति दी।

दोहा

बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस। उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस॥ २५ ॥

अर्थ:

प्रभु की आज्ञा सिर पर धारण कर और श्रीरामजी के युगल चरणों को, जिनकी ब्रह्मा और महेश भी वंदना करते हैं, हृदय में धारण कर वह (स्वयंप्रभा) बदरीबन को चली गयी।