समुद्र लांघने का परामर्श, जांबवंत का हनुमानजी को बल याद दिलाकर उत्साहित करना

वानर वीर विचार करते हैं कि समुद्र को कौन लांघ सकता है। तब जांबवंत हनुमानजी को उनके अप्रतिम बल, बुद्धि और सामर्थ्य का स्मरण कराकर महान कार्य के लिए प्रेरित करते हैं।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण १३ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥ मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥ १ ॥

अर्थ:

जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लाँध सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजी का कार्य कर सकेगा। [निराश होकर घबराओ मत] मुझे देखकर मन में धीरज धरो। देखो, श्रीरामजी की कृपा से [देखते-ही-देखते] मेरा शरीर कैसा हो गया (बिना पाँख का बेहाल था, पाँख उगने से सुन्दर हो गया)!

चौपाई

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं॥ तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई॥ २ ॥

अर्थ:

पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागर से तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजी को हृदय में धारण करके उपाय करो।

चौपाई

अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ॥ निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा॥ ३ ॥

अर्थ:

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी! इस प्रकार कहकर जब गीध चला गया, तब उन (वानरों) के मन में अत्यन्त विस्मय हुआ। सब किसी ने अपना-अपना बल कहा, पर समुद्र के पार जाने में सभी ने सन्देह प्रकट किया।

चौपाई

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा॥ जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी॥ ४ ॥

अर्थ:

ऋक्षराज जाम्बवान् कहने लगे-मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीर में पहले वाले बल का लेश भी नहीं रहा। जब खरारि (खर के शत्रु श्रीराम) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझ में बड़ा बल था।

दोहा

बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ। उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ॥ २९ ॥

अर्थ:

बलि के बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीर का वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ी में दौड़कर [उस शरीर की] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं।

दोहा 30 के अंतर्गत
चौपाई

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥ जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक॥ १ ॥

अर्थ:

अंगद ने कहा-मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समय के लिये हृदय में कुछ सन्देह है। जाम्बवान ने कहा--तुम सब प्रकार से योग्य हो। परन्तु तुम सब के नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय?

चौपाई

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ २ ॥

अर्थ:

ऋक्षराज जाम्बवान् ने श्रीहनुमान् जी से कहा-हे हनुमान्! हे बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो।

चौपाई

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥ ३ ॥

अर्थ:

जगत् में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्रीरामजी के कार्य के लिये ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान् जी पर्वताकार के (अत्यन्त विशालकाय) हो गये।

चौपाई

कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥ सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥ ४ ॥

अर्थ:

उनका सोने का-सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरे पर्वतों के राजा सुमेरु हों। हनुमान् जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा-मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ।

चौपाई

सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥ जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥ ५ ॥

अर्थ:

और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [कि मुझे क्या करना चाहिये]।

चौपाई

एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥ तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥ ६ ॥

अर्थ:

[जाम्बवान् ने कहा--] हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबल से [ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आयेंगे, केवल] खेल के लिये ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे।