निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि
निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि
दोहा २६ · किष्किन्धाकाण्ड
दोहा पाठ
निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥ २६ ॥
अर्थ
देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों के लिये प्रभु अपनी इच्छासे [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकार के मोक्षों को त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “संपाती से भेंट और सीता के समाचार” प्रकरण का दोहा २६ है। इस प्रकरण में समुद्रतट पर वानरों की संपाती से भेंट और सीताजी के लंका में होने के समाचार का वर्णन है।
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संपाती से भेंट और सीता के समाचार