गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका
चौपाई ६, दोहा २८ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका॥ तहँ असोक उपबन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत अहई॥ ६ ॥
अर्थ
त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। वहाँ स्वभाव ही से निडर रावण रहता है। वहाँ अशोक नाम का उपवन (बगीचा) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [इस समय भी] वे सोच में मग्र बैठी हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “संपाती से भेंट और सीता के समाचार” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा २८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समुद्रतट पर वानरों की संपाती से भेंट और सीताजी के लंका में होने के समाचार का वर्णन है।
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संपाती से भेंट और सीता के समाचार