जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता
चौपाई ५, दोहा २८ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता॥ मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू॥ ५ ॥
अर्थ
और तेरे पंख उग आयेंगे; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजी को दिखा देना। मुनि की वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभु का कार्य करो।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “संपाती से भेंट और सीता के समाचार” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा २८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समुद्रतट पर वानरों की संपाती से भेंट और सीताजी के लंका में होने के समाचार का वर्णन है।
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संपाती से भेंट और सीता के समाचार