सुग्रीव-राम संवाद और सीताजी की खोज के लिए बंदरों का प्रस्थान

सुग्रीव विनयपूर्वक श्रीरामजी से मिलकर आगे की योजना प्रस्तुत करता है। फिर वानरों के विशाल दल चारों दिशाओं में सीताजी की खोज के लिए भेजे जाते हैं।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण १० / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥ अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटइ राम करहु जौं दाया॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव ने कहा--हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव! आपकी माया अत्यन्त ही प्रबल है। आप जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छूटती है।

चौपाई

बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी॥ नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा॥ २ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयों के वश में हैं। फिर मैं तो पामर पशु और पशुओं में भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्री के नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयंकर क्रोधरूपी अँधेरी रात में भी जागता रहता है (क्रोधान्ध नहीं होता)।

चौपाई

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया॥ यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई॥ ३ ॥

अर्थ:

और लोभ की फाँसी से जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आप ही के समान है। ये गुण साधन से नहीं प्राप्त होते। आपकी कृपा से ही कोई-कोई इन्हें पाते हैं।

चौपाई

तब रघुपति बोले मुसुकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई॥ अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

तब श्रीरघुनाथजी मुसकराकर बोले--हे भाई! तुम मुझे भरत के समान प्यारे हो। अब मन लगाकर वही उपाय करो जिस उपाय से सीता की खबर मिले।

दोहा

एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ। नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरूथ॥ २१ ॥

अर्थ:

इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरों के यूथ (झुंड) आ गये। अनेक रंगों के वानरों के दल सब दिशाओं में दिखायी देने लगे।

दोहा 22 के अंतर्गत
चौपाई

बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा॥ आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा॥ १ ॥

अर्थ:

शिवजी कहते हैं--हे उमा! वानरों की वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान् मूर्ख है। सब वानर आकर श्रीरामजी के चरणों में मस्तक नवाते हैं और [सौन्दर्य-माधुर्यनिधि] श्रीमुख के दर्शन करके कृतार्थ होते हैं।

चौपाई

अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं॥ यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई॥ २ ॥

अर्थ:

सेना में एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे श्रीरामजी ने कुशल न पूछी हो। प्रभु के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि श्रीरघुनाथजी विश्वरूप तथा सर्वव्यापक हैं (सारे रूपों और सब स्थानों में हैं)।

चौपाई

ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई॥ राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा॥ ३ ॥

अर्थ:

आज्ञा पाकर सब जहाँ-तहाँ खड़े हो गये। तब सुग्रीव ने सबको समझाकर कहा कि हे वानरों के समूहो! यह श्रीरामचन्द्रजी का कार्य है और मेरा निहोरा (अनुरोध) है; तुम चारों ओर जाओ।

चौपाई

जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई॥ अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ॥ ४ ॥

अर्थ:

और जाकर जानकीजी को खोजो। हे भाई! महीने भर में वापस आ जाना। जो अवधि बिताकर बिना सुधि पाए लौट आएगा, उसे मेरे द्वारा मरवाना ही पड़ेगा।

दोहा

बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत। तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत॥ २२ ॥

अर्थ:

सुग्रीव के वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहाँ-तहाँ (भिन्न-भिन्न दिशाओं में) चल दिये। तब सुग्रीव ने अंगद, नल, हनुमान् आदि प्रधान-प्रधान योद्धाओं को बुलाया [और कहा-- ]।

दोहा 23 के अंतर्गत
चौपाई

सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥ सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेहु सब काहू॥ १ ॥

अर्थ:

हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान्! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशाओं में जाओ और सब किसी से सीताजी का पता पूछना।

चौपाई

मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु॥ भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी॥ २ ॥

अर्थ:

मन, वचन तथा कर्म से उसी का उपाय सोचना। श्रीरामचन्द्रजी का कार्य सम्पन्न करना। सूर्य को पीठ से और अग्नि को हृदय से सेवन करना चाहिये। परन्तु स्वामी की सेवा तो छल छोड़कर सर्वभाव से करनी चाहिये।

चौपाई

तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भवसंभव सोका॥ देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई॥ ३ ॥

अर्थ:

माया (विषयों की ममता-आसक्ति) को छोड़कर परलोक का सेवन करना चाहिये, जिससे भव (जन्म-मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायें। हे भाई! देह धारण करने का यही फल है कि सब कामों (कामनाओं) को छोड़कर श्रीरामजी का भजन ही किया जाय।

चौपाई

सोइ गुनग्य सोई बड़भागी। जो रघुबीर चरन अनुरागी॥ आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई॥ ४ ॥

अर्थ:

सद्गुणों को पहचानने वाला (गुणवान्) तथा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजी के चरणों का प्रेमी है। आज्ञा माँगकर और चरणों में फिर सिर नवाकर श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले।

चौपाई

पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥ परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥ ५ ॥

अर्थ:

सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमानजी ने सिर नवाया। कार्य का विचार करके प्रभु ने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर-कमल से उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अँगूठी दे दी।

चौपाई

बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु॥ हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना॥ ६ ॥

अर्थ:

बहुत प्रकार से सीता को समझाना और मेरा बल तथा विरह कहकर तुम शीघ्र लौट आना। हनुमानजी ने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभु को हृदय में धारण करके वे चले।

चौपाई

जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता॥ ७ ॥

अर्थ:

यद्यपि देवताओं की रक्षा करने वाले प्रभु सब बात जानते हैं, तो भी वे राजनीति की रक्षा कर रहे हैं। (नीति की मर्यादा रखने के लिये सीता जी का पता लगाने को जहाँ-तहाँ वानरों को भेज रहे हैं)।

दोहा

चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह। राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह॥ २३ ॥

अर्थ:

सब वानर वन, नदी, सरोवर, पर्वत और पर्वतों की कंदराओं में खोजते हुए चले जा रहे हैं। मन श्रीरामजी के कार्य में लवलीन है। शरीर तक का प्रेम (ममत्व) भूल गया है।

दोहा 24 के अंतर्गत
चौपाई

कतहुँ होइ निसिचर सैं भेंटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा॥ बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिं॥ १ ॥

अर्थ:

कहीं किसी राक्षस से भेंट हो जाती है, तो एक-एक चपत में ही उसके प्राण ले लेते हैं। पर्वतों और वनों को बहुत प्रकार से खोज रहे हैं। कोई मुनि मिल जाता है तो पता पूछने के लिये उसे सब घेर लेते हैं।

चौपाई

लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने॥ मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना॥ २ ॥

अर्थ:

इतने में ही सबको अत्यन्त प्यास लगी, जिससे सब अत्यन्त ही व्याकुल हो गये। किन्तु जल कहीं नहीं मिला। घने जंगल में सब भटक गये। हनुमानजी ने मन में अनुमान किया कि जल पिये बिना सब लोग मरना ही चाहते हैं।

चौपाई

चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबर एक कौतुक पेखा॥ चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्होंने पहाड़ की चोटी पर चढ़कर चारों ओर देखा तो पृथ्वी के भीतर एक गुफा में उन्हें एक कौतुक (आश्चर्य) दिखायी दिया। उसके ऊपर चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं और बहुत-से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे हैं।

चौपाई

गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा॥ आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

पवनकुमार हनुमानजी पर्वत से उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी। सबने हनुमानजी को आगे कर लिया और वे गुफा में घुस गये, देर नहीं की।

दोहा

दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज। मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज॥ २४ ॥

अर्थ:

अंदर जाकर उन्होंने एक उत्तम उपवन (बगीचा) और तालाब देखा, जिसमें बहुत-से कमल खिले हुए हैं। वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है।