बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी

चौपाई २, दोहा २१ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी॥ नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा॥ २ ॥

अर्थ

हे स्वामी! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयों के वश में हैं। फिर मैं तो पामर पशु और पशुओं में भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्री के नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयंकर क्रोधरूपी अँधेरी रात में भी जागता रहता है (क्रोधान्ध नहीं होता)।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव-राम संवाद और सीताजी की खोज हेतु वानर दलों का चारों दिशाओं में प्रस्थान का वर्णन है।

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सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान