मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु

चौपाई २, दोहा २३ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु॥ भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी॥ २ ॥

अर्थ

मन, वचन तथा कर्म से उसी का उपाय सोचना। श्रीरामचन्द्रजी का कार्य सम्पन्न करना। सूर्य को पीठ से और अग्नि को हृदय से सेवन करना चाहिये। परन्तु स्वामी की सेवा तो छल छोड़कर सर्वभाव से करनी चाहिये।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव-राम संवाद और सीताजी की खोज हेतु वानर दलों का चारों दिशाओं में प्रस्थान का वर्णन है।

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सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान