पाछें पवन तनय सिरु नावा
पाछें पवन तनय सिरु नावा
चौपाई ५, दोहा २३ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥ परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी॥ ५ ॥
अर्थ
सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमानजी ने सिर नवाया। कार्य का विचार करके प्रभु ने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर-कमल से उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अँगूठी दे दी।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा २३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव-राम संवाद और सीताजी की खोज हेतु वानर दलों का चारों दिशाओं में प्रस्थान का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान