श्रीराम की सुग्रीव पर नाराजी, लक्ष्मणजी का कोप

वर्षा बीत जाने पर भी सुग्रीव द्वारा सीताजी की खोज का कार्य आरंभ न होने से श्रीरामजी अप्रसन्न होते हैं। तब लक्ष्मणजी प्रखर क्रोध के साथ किष्किंधा की ओर प्रस्थान करते हैं।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ९ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई॥ एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीति निमिष महुँ आनौं॥ १ ॥

अर्थ:

वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद ऋतु आ गयी। परन्तु हे तात! सीता की कोई खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो काल को भी जीतकर पल भर में जानकी को ले आऊँ।

चौपाई

कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनउँ सोई॥ सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी॥ २ ॥

अर्थ:

कहीं भी रहे, यदि जीवित होगी तो हे तात! प्रयत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा। राज्य, कोष, पुर और नारी पा गया, इसलिये सुग्रीव ने भी मेरी सुधि भुला दी।

चौपाई

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥ जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥ ३ ॥

अर्थ:

जिस बाण से मैंने बाली को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ! [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? [यह तो लीलामात्र है।

चौपाई

जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥ लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना॥ ४ ॥

अर्थ:

ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रीति मान ली है, वे ही इस चरित्र (लीलारहस्य) को जानते हैं। लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथ में ले लिये।

दोहा

तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव। भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥ १८ ॥

अर्थ:

तब दया की सीमा श्रीरघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को समझाया कि हे तात! सखा सुग्रीव को केवल भय दिखलाकर ले आओ [उसे मारने की बात नहीं है]।

दोहा 19 के अंतर्गत
चौपाई

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥ निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥ १ ॥

अर्थ:

यहाँ (किष्किन्धा नगरी में) पवनकुमार श्रीहनुमानजी ने विचार किया कि सुग्रीव ने श्रीरामजी के कार्य को भुला दिया। उन्होंने सुग्रीव के पास जाकर चरणों में सिर नवाया। [साम, दान, दण्ड, भेद] चारों प्रकार की नीति कहकर उन्हें समझाया।

चौपाई

सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना॥ अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा॥ २ ॥

अर्थ:

हनुमानजी के वचन सुनकर सुग्रीव ने बहुत ही भय माना। [और कहा--] विषयों ने मेरे ज्ञान को हर लिया। अब हे पवनसुत! जहाँ-तहाँ वानरों के यूथ रहते हैं; वहाँ दूतों के समूहों को भेजो।

चौपाई

कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई॥ तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता॥ ३ ॥

अर्थ:

और कहला दो कि एक पखवाड़े में (पंद्रह दिनों में) जो न आ जायगा, उसका मेरे हाथों वध होगा। तब हनुमानजी ने दूतों को बुलाया और सबका बहुत सम्मान करके--।

चौपाई

भय अरु प्रीति नीति देखराई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई॥ एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए॥ ४ ॥

अर्थ:

सबको भय, प्रीति और नीति दिखलायी। सब बंदर चरणों में सिर नवाकर चले। इसी समय लक्ष्मणजी नगर में आये। उनका क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे।

दोहा

धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार। ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार॥ १९ ॥

अर्थ:

तदनन्तर लक्ष्मणजी ने धनुष चढ़ाकर कहा कि नगर को जलाकर अभी राख कर दूँगा। तब नगर भर को व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगदजी उनके पास आये।

दोहा 20 के अंतर्गत
चौपाई

चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही॥ क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना॥ १ ॥

अर्थ:

अंगद ने उनके चरणों में सिर नवाकर विनती की (क्षमायाचना की)। तब लक्ष्मणजी ने उनको अभय बाँह दी (भुजा उठाकर कहा कि डरो मत)। सुग्रीव ने अपने कानों से लक्ष्मणजी को क्रोधयुक्त सुनकर भय से अत्यन्त व्याकुल होकर कहा--।

चौपाई

सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा॥ तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना॥ २ ॥

अर्थ:

हे हनुमान! सुनो, तुम तारा को साथ ले जाकर विनती करके कुमार को समझाओ (समझा-बुझाकर शान्त करो)। हनुमानजी ने तारासहित जाकर लक्ष्मणजी के चरणों की वन्दना की और प्रभु के सुन्दर यश का बखान किया।

चौपाई

करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए॥ तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा॥ ३ ॥

अर्थ:

वे विनती करके उन्हें महल में ले आये तथा चरणों को धोकर उन्हें पलँग पर बैठाया। तब वानरराज सुग्रीव ने उनके चरणों में सिर नवाया और लक्ष्मणजी ने हाथ पकड़कर उनको गले से लगा लिया।

चौपाई

नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं॥ सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा॥ ४ ॥

अर्थ:

[सुग्रीव ने कहा--] हे नाथ! विषय के समान और कोई मद नहीं है। यह मुनियों के मन में भी क्षणमात्र में मोह उत्पन्न कर देता है [फिर मैं तो विषयी जीव ही ठहरा]। सुग्रीव के विनययुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणजी ने सुख पाया और उनको बहुत प्रकार से समझाया।

चौपाई

पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई॥ ५ ॥

अर्थ:

तब पवनसुत हनुमान् जी ने जिस प्रकार सब दिशाओं में दूतों के समूह गये थे वह सब हाल सुनाया।

दोहा

हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ। रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ॥ २० ॥

अर्थ:

तब अंगद आदि वानरों को साथ लेकर और श्रीरामजी के छोटे भाई लक्ष्मणजी को आगे करके (अर्थात् उनके पीछे-पीछे) सुग्रीव हर्षित होकर चले और जहाँ रघुनाथजी थे वहाँ आये।