श्रीराम की सुग्रीव पर नाराजी, लक्ष्मणजी का कोप
वर्षा बीत जाने पर भी सुग्रीव द्वारा सीताजी की खोज का कार्य आरंभ न होने से श्रीरामजी अप्रसन्न होते हैं। तब लक्ष्मणजी प्रखर क्रोध के साथ किष्किंधा की ओर प्रस्थान करते हैं।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ९ / १४
प्रकरण पाठ
जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥ जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥ ३ ॥
अर्थ:
जिस बाण से मैंने बाली को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ! [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? [यह तो लीलामात्र है।
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥ लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना॥ ४ ॥
अर्थ:
ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रीति मान ली है, वे ही इस चरित्र (लीलारहस्य) को जानते हैं। लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथ में ले लिये।
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥ निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥ १ ॥
अर्थ:
यहाँ (किष्किन्धा नगरी में) पवनकुमार श्रीहनुमानजी ने विचार किया कि सुग्रीव ने श्रीरामजी के कार्य को भुला दिया। उन्होंने सुग्रीव के पास जाकर चरणों में सिर नवाया। [साम, दान, दण्ड, भेद] चारों प्रकार की नीति कहकर उन्हें समझाया।
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही॥ क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना॥ १ ॥
अर्थ:
अंगद ने उनके चरणों में सिर नवाकर विनती की (क्षमायाचना की)। तब लक्ष्मणजी ने उनको अभय बाँह दी (भुजा उठाकर कहा कि डरो मत)। सुग्रीव ने अपने कानों से लक्ष्मणजी को क्रोधयुक्त सुनकर भय से अत्यन्त व्याकुल होकर कहा--।
सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा॥ तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना॥ २ ॥
अर्थ:
हे हनुमान! सुनो, तुम तारा को साथ ले जाकर विनती करके कुमार को समझाओ (समझा-बुझाकर शान्त करो)। हनुमानजी ने तारासहित जाकर लक्ष्मणजी के चरणों की वन्दना की और प्रभु के सुन्दर यश का बखान किया।
नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं॥ सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा॥ ४ ॥
अर्थ:
[सुग्रीव ने कहा--] हे नाथ! विषय के समान और कोई मद नहीं है। यह मुनियों के मन में भी क्षणमात्र में मोह उत्पन्न कर देता है [फिर मैं तो विषयी जीव ही ठहरा]। सुग्रीव के विनययुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणजी ने सुख पाया और उनको बहुत प्रकार से समझाया।