नाइ चरन सिरु कह कर जोरी

चौपाई १, दोहा २१ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥ अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटइ राम करहु जौं दाया॥ १ ॥

अर्थ

श्रीरघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव ने कहा--हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव! आपकी माया अत्यन्त ही प्रबल है। आप जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छूटती है।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव-राम संवाद और सीताजी की खोज हेतु वानर दलों का चारों दिशाओं में प्रस्थान का वर्णन है।

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सुग्रीव-राम संवाद और वानरों का प्रस्थान