अस बिचारि संकरु मतिधीरा
अस बिचारि संकरु मतिधीरा
चौपाई २, दोहा ५७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥ चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥ २ ॥
अर्थ
ऐसा विचारकर स्थिरबुद्धि शंकरजी श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए अपने भवन (कैलास) को चले। चलते समय सुन्दर आकाशवाणी हुई कि हे महेश! आपकी जय हो। आपने भक्ति की अच्छी दृढ़ता की।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।
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शिवजी द्वारा सती का त्याग