जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा
चौपाई ३, दोहा ६२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥ तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥ ३ ॥
अर्थ
यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये, तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
शिवजी द्वारा सती का त्याग