संकर रुख अवलोकि भवानी

चौपाई २, दोहा ५८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥ निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥ २ ॥

अर्थ

शिवजी का रुख देखकर सतीजी ने जान लिया कि स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदय में व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [भीतर-ही-भीतर] कुम्हार के आँवे के समान अत्यन्त जलने लगा।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।

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शिवजी द्वारा सती का त्याग