तब संकर प्रभु पद सिरु नावा

चौपाई १, दोहा ५७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥ एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥ १ ॥

अर्थ

तब शिवजी ने प्रभु के चरणों में सिर नवाया और श्रीरामजी का स्मरण करते ही उनके हृदय में ऐसा आया कि इस शरीर से सती से मेरी [पति-पत्नीरूप में] भेंट नहीं हो सकती। शिवजी ने अपने मन में यह संकल्प कर लिया।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।

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शिवजी द्वारा सती का त्याग