नित नव सोचु सती उर भारा

चौपाई १, दोहा ५९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥ मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥ १ ॥

अर्थ

सतीजी के हृदय में नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख-समुद्र के पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजी का अपमान किया और फिर पति के वचनों को झूठ जाना--।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।

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शिवजी द्वारा सती का त्याग