ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना
चौपाई २, दोहा ६२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥ जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥ २ ॥
अर्थ
एक बार ब्रह्मा की सभा में हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसी से वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी ! जो तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।
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शिवजी द्वारा सती का त्याग