जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति
सोरठा ५७ (ख) · बालकाण्ड
सोरठा पाठ
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥ ५७ (ख) ॥
अर्थ
प्रीति की सुन्दर रीति देखिये कि जल भी [दूध के साथ मिलकर] दूध के समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद [प्रेम] जाता रहता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का सोरठा ५७ (ख) है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
शिवजी द्वारा सती का त्याग