हृदयँ सोचु समुझत निज करनी

चौपाई १, दोहा ५८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥ कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥ १ ॥

अर्थ

अपनी करनी को याद करके सतीजी के हृदय में इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [उन्होंने समझ लिया कि] शिवजी कृपा के परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकट में उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी द्वारा सती का त्याग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिवजी द्वारा सती को त्यागने और गहन समाधि में लीन होने का वर्णन है।

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शिवजी द्वारा सती का त्याग