बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित
बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित
सोरठा २५१ · अयोध्याकाण्ड
सोरठा पाठ
बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम॥ २५१ ॥
अर्थ
सब लोग प्रतिदिन प्रमुदित होकर वन में चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली वर्षा के जल से मेढक और मोर मोटे हो जाते हैं (प्रसन्न होकर नाचते-कूदते हैं)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का सोरठा २५१ है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।
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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप