कोल किरात भिल्ल बनबासी
कोल किरात भिल्ल बनबासी
चौपाई १, दोहा २५० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥ भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी॥ १ ॥
अर्थ
कोल, किरात और भील आदि वन के रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृत के समान स्वादिष्ट मधु (शहद) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर-भरकर तथा कंद, मूल, फल और अंकुर आदि की जूड़ियों को।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।
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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप