तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे
चौपाई १, दोहा २५१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥ देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईंधनु पात किरात मिताई॥ १ ॥
अर्थ
आप प्रिय पाहुने वन में पधारे हैं। आपकी सेवा करने के योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं। हे स्वामी! हम आपको क्या देंगे? भीलों की मित्रता तो बस, ईंधन (लकड़ी) और पत्तों ही तक है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।
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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप