एकउ जुगुति न मन ठहरानी
एकउ जुगुति न मन ठहरानी
चौपाई ४, दोहा २५३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥ प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥ ४ ॥
अर्थ
एक भी युक्ति भरतजी के मन में न ठहरी। सोचते-ही-सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजी ने उनको बुलवा भेजा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।
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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप