पाप करत निसि बासर जाहीं
पाप करत निसि बासर जाहीं
चौपाई ३, दोहा २५१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥ सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥ ३ ॥
अर्थ
हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारी कमर में कपड़ा है और न पेट ही भरता है। हममें स्वप्न में भी कभी धर्मबुद्धि कैसी? यह सब तो श्रीरघुनन्दन के दर्शन का प्रभाव है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।
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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप