यह हमारि अति बड़ि सेवकाई

चौपाई २, दोहा २५१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई॥ हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती॥ २ ॥

अर्थ

हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते। हम जड़ जीव हैं, जीवों की हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।

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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप