निसि न नीद नहिं भूख दिन

दोहा २५२ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥ २५२ ॥

अर्थ

भरतजी को न तो रात को नींद आती है, न दिन में भूख ही लगती है। वे पवित्र सोच में ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे की कीचड़ में डूबी हुई मछली जल के संकोच से व्याकुल होती है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का दोहा २५२ है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।

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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप