हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा
चौपाई ४, दोहा २५० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥ राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥ ४ ॥
अर्थ
हम लोगों को आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमि के लिये गंगाजी की धारा दुर्लभ है! [देखिये, ] कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने निषाद पर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजा को भी होना चाहिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।
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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप