मोहि अनुचर कर केतिक बाता
मोहि अनुचर कर केतिक बाता
चौपाई ३, दोहा २५३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥ जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥ ३ ॥
अर्थ
मुझ सेवक की तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म होगा, क्योंकि सेवक का धर्म हरिगिरि से भी भारी है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।
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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप