लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं

चौपाई ४, दोहा २५२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं॥ यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ

लोक और वेद में प्रसिद्ध है और कवि (ज्ञानी) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजी से विमुख हैं उन्हें नरक में भी ठौर नहीं मिलता। सब के मन में यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचन्द्रजी का अयोध्या जाना होगा या नहीं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली के सत्कार और कैकेयी के गहन पश्चाताप का वर्णन है।

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वनवासियों द्वारा सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप