कहि सपेम सब कथाप्रसंगू
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू
चौपाई ४, दोहा २२२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू॥ भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी॥ ४ ॥
अर्थ
श्रीरामजी के राजतिलक का आनन्द जिस प्रकार से भंग हुआ था वह सब कथाप्रसंग प्रेमपूर्वक कहकर फिर वह भाग्यवती स्त्री श्रीभरतजी के शील, स्नेह और स्वभाव की सराहना करने लगी।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।
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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में