भायप भगति भरत आचरनू
भायप भगति भरत आचरनू
चौपाई १, दोहा २२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू॥ जो किछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई॥ १ ॥
अर्थ
भरतजी का भाईपना, भक्ति और इन का आचरण कहने और सुनने से दुःख और दोषों के हरनेवाले हैं। हे सखी! उनके सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा जाय, वह थोड़ा है। श्रीरामचन्द्रजी के भाई ऐसे क्यों न हों ?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।
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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में