मंगल सगुन होहिं सब काहू
मंगल सगुन होहिं सब काहू
चौपाई १, दोहा २२५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू॥ भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू॥ १ ॥
अर्थ
सबको मंगलसूचक शकुन हो रहे हैं। सुख देनेवाले [पुरुषों के दाहिने और स्त्रियों के बायें] नेत्र और भुजाएँ फड़क रही हैं। समाज सहित भरतजी को उत्साह हो रहा है कि श्रीरामचन्द्रजी मिलेंगे और दुःख का दाह मिट जायगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।
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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में