मनहीं मन मागहिं बरु एहू

चौपाई २, दोहा २२४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू॥ मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी॥ २ ॥

अर्थ

और मन-ही-मन यह वरदान माँगते हैं कि श्रीसीतारामजी के चरणकमलों में प्रेम हो। मार्ग में भील, कोल आदि वनवासी तथा वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और विरक्त मिलते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।

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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में