बेषु न सो सखि सीय न
बेषु न सो सखि सीय न
चौपाई २, दोहा २२२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा॥ नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा॥ २ ॥
अर्थ
परन्तु हे सखी! इनका न तो वह वेष है (वल्कल-वस्त्रधारी मुनिवेष), न सीताजी ही संग हैं। और इनके आगे चतुरंगिणी सेना चली जा रही है। फिर इनके मुख प्रसन्न नहीं हैं, इनके मन में खेद है। हे सखी! इसी भेद के कारण सन्देह होता है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।
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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में