करत मनोरथ जस जियँ जाके
करत मनोरथ जस जियँ जाके
चौपाई २, दोहा २२५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके॥ सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं॥ २ ॥
अर्थ
जिसके जी में जैसा है, वह वैसा ही मनोरथ करता है। सब स्नेहरूपी मदिरा से छके ( प्रेम में मतवाले हुए) चले जा रहे हैं। अंग शिथिल हैं, रास्ते में पैर डगमगा रहे हैं और प्रेमवश विह्वल वचन बोल रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरतजी चित्रकूट के मार्ग में