भरत प्रेमु तेहि समय जस तस

दोहा २२५ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु। कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥ २२५ ॥

अर्थ

भरतजी का उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते। कवि के लिए तो वह वैसा ही अगम है जैसा अहंता और ममतासे मलिन मनुष्यों के लिए ब्रह्मसुखु !।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का दोहा २२५ है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।

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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में