प्रात पार भए एकहि खेवाँ

चौपाई २, दोहा २२१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रात पार भए एकहि खेवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ॥ चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई॥ २ ॥

अर्थ

सबेरे एक ही खेवे में सब लोग पार हो गये और श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज की इस सेवासे सन्तुष्ट हुए। फिर स्नान करके और नदी को सिर नवाकर निषादराज के साथ दोनों भाई चले।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।

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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में