कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन

चौपाई ३, दोहा २२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन॥ कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी॥ ३ ॥

अर्थ

कोई कहती हैं--इसमें रानी का भी दोष नहीं है। यह सब विधाता ने ही किया है, जो हमारे अनुकूल है। कहाँ तो हम लोक और वेद दोनों की विधि (मर्यादा) से हीन, कुल और करतूत दोनों से मलिन तुच्छ स्त्रियाँ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी चित्रकूट के मार्ग में” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का चित्रकूट की ओर विरह और दीनभाव से प्रस्थान का वर्णन है।

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भरतजी चित्रकूट के मार्ग में