पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें
चौपाई २, दोहा २१६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें॥ रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू॥ २ ॥
अर्थ
तदनन्तर रास्ते की पहचान रखनेवाले लोगों (कुशल पथप्रदर्शकों) के साथ सब लोगों को लिये हुए भरतजी चित्रकूट में चित्त लगाये चले। भरतजी रामसखा गुह के हाथ में हाथ दिये हुए ऐसे जा रहे हैं, मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये हुए हो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनके साथियों का दिव्य तपोबल से अद्भुत सत्कार का वर्णन है।
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भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार