रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी
चौपाई ४, दोहा २१५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी॥ स्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा॥ ४ ॥
अर्थ
वसन्त-ऋतु है। शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकार की हवा बह रही है। सभी को [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगों को देखकर सब लोग हर्ष और विषाद के वश हो रहे हैं। [हर्ष तो भोग-सामग्रियों को और मुनि के तपःप्रभाव को देखकर होता है और विषाद इस बात से होता है कि श्रीराम के वियोग में नियम-व्रत से रहनेवाले हम लोग भोग-विलास में क्यों आ फँसे; कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतों को न त्याग दे]।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २१५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनके साथियों का दिव्य तपोबल से अद्भुत सत्कार का वर्णन है।