असन पान सुचि अमिअ अमी से

चौपाई ३, दोहा २१५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

असन पान सुचि अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से॥ सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें॥ ३ ॥

अर्थ

तथा अमृत के भी अमृत-सरीखे पवित्र खान-पान के पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों (विरक्त मुनियों) की भाँति सकुचा रहे हैं। सभी के डेरों में [मनोवांछित वस्तु देनेवाले] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणी को भी अभिलाषा होती है (उनका भी मन ललचा जाता है)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २१५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनके साथियों का दिव्य तपोबल से अद्भुत सत्कार का वर्णन है।

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भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार