सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू

चौपाई १, दोहा २१३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥ जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी॥ १ ॥

अर्थ

मुनि के वचन सुनकर भरत के हृदय में सोच हुआ कि यह बेमौके बड़ा बेढब संकोच आ पड़ा! फिर गुरुजनों की वाणी को महत्त्वपूर्ण (आदरणीय) समझकर, चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले--।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २१३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनके साथियों का दिव्य तपोबल से अद्भुत सत्कार का वर्णन है।

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भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार